कीचड़

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कीचड़ में गिरे तुम क्या ख़ूब मैले निकले
जब मौक़ा मिला धवल नेह का
तो चीख़ उठा तुम्हारा प्यार –
आह मुझे सौंदर्य का वरदान ना दो,
मैं तो माटी के दलदल का वो गहरा गूढ़ हूँ
कि तुम जब पुकार लेते हो
मीलों नीचे गड़ जाता हूँ
और कहता हूँ – इस कायर को अब ऊँचाइयों का
अभिमान ना दो, इस गिरे को देखो भी मत –
हवा चंचल और रसिक जल थल का
सूखे मरुथल को संज्ञान ना दो ।

(C) Pallavi Singh

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