Pallavi Singh

pallavi singhIF I had to choose one description above all that I do, I would call myself a storyteller. I have put people in my stories for over a decade, starting with it at a time India media was still discovering the virtues of long form and enterprise reportage. My assigned beats implored the journalist in me to break stories. Yet, my obsessive quest to talk about people in my stories led me to report on bomb blasts, true crime and violent caste agitations in India with the richness of layered narrative frameworks.

In the past, I have worked as a Long Form and Enterprise writer with Mint, The Indian Express and Hindustan Times. Of all the themes important to journalism, what intrigues me most is the political economy of development, international trade and its impact on people and households, the China shift in the world economy, and identity politics around Muslims in India.

I was a scholar at London School of Economics and Political Science and studied International Trade, Economic History of India and East and Southeast Asia and Political Economy of Development as part of the M.Sc. programme.

In my previous role, I led marketing and communications roles for some of India’s leading startups including PropTiger and Makaan. When I am not working on my projects, day-dreaming and traveling, I write including op-eds for Newslaundry.

Read my opinion in Newslaundry here.
Reportage and Long Form Enterprise stories in The Indian Express here and in Mint here

Email me: storycellar@gmail.com

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मुझे अगर ख़ुद के बारे में एक शब्द में आपको बताना हो, तो मैं स्वयं को पहले कहानीकार कहूँगी। मैंने एक दशक से ज़्यादा समय लोगों को अपनी कहानियों में लाने में लगाया है। मुझे पत्रकार के तौर पर दिए गए मुद्दों ने ब्रेकिंग न्यूज़ की तरफ़ बढ़ाया। परंतु मेरी ललक और बेचैनी मुझे हमेशा लोगों की तरफ़ खींचती रही। इसी खोज ने मुझे बम धमाके से लेकर अपराध से लेकर जाति के किए लड़े जाने वाले आंदोलनों पर समवेदनशील तरीक़े से लिखना सिखाया।

मैं एक पत्रकार के रूप में हिंदुस्तान टाइम्ज़ के मिंट, इंदीयन इक्स्प्रेस के लिए लिख चुकी हूँ। आज पत्रकारितआ के लिए जितने भी विषय हैं, उनमें मुझे सबसे ज़्यादा विचलित करते हैं विकास की पलिटिकल इकॉनमी का मुद्दा, अंतर राष्ट्रीय व्यवसाय और उसका प्रभाव लोगों और घरों पर, वैश्विक इकॉनमी में चाइना का बढ़ता महत्व और हिंदुस्तान के अल्पसंख्यक लोगों को लेकर अस्मिता की राजनीति!

मैं लंदन स्कूल अव एकनामिक्स मैं अंतर राष्ट्रीय पलिटिकल इकॉनमी की स्कॉलर रही हूँ जहाँ मैंने अंतर राष्ट्रीय व्यवसाय और विकास, भारत का व्यावसायिक  इतिहास और पूर्व और दक्षिण पूर्व एज़ा पर एक्स्पर्टीज़ हासिल की है।

आप मेरे वैचारिक लेख यहाँ पढ़ सकते हैं।

इंदीयन इक्स्प्रेस और मिंट में लिखे गए रिपोर्ट्स यहाँ हैं।

मुझे आप यहाँ ईमेल कर सकते हैं: storycellar@gmail.com